उपनिषद और वेदांत
तैत्तिरीय उपनिषद दीक्षा मंत्र
गुरु / माता-पिता
तैत्तिरीय उपनिषद की यह शिक्षा सत्य, धर्म और माता-पिता-गुरु-अतिथि के सम्मान की नींव रखती है।
कब जपें
शिक्षा पूर्ण होने पर, दीक्षांत समारोह में, या नैतिक शिक्षा के रूप में बच्चों को सिखाने के लिए।
संस्कृत श्लोक
सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि॥
उच्चारण (रोमन)
Satyam Vada. Dharmam Chara. Swadhyayanma Pramadah. Matri Devo Bhava. Pitri Devo Bhava. Acharya Devo Bhava. Atithi Devo Bhava. Yanyanavadyani Karmani Tani Sevitavyani No Itarani.
हिंदी में अर्थ
सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। स्वाध्याय में आलस्य न करो। माता को देवता समान मानो। पिता को देवता समान मानो। आचार्य को देवता समान मानो। अतिथि को देवता समान मानो। जो कर्म निर्दोष हों, उन्हीं का अनुसरण करो, अन्य का नहीं।
सामान्य प्रश्न
तैत्तिरीय उपनिषद दीक्षा मंत्र क्या है और इसका क्या महत्व है? +
तैत्तिरीय उपनिषद की यह शिक्षा सत्य, धर्म और माता-पिता-गुरु-अतिथि के सम्मान की नींव रखती है।
तैत्तिरीय उपनिषद दीक्षा मंत्र कब जपना चाहिए? +
शिक्षा पूर्ण होने पर, दीक्षांत समारोह में, या नैतिक शिक्षा के रूप में बच्चों को सिखाने के लिए।
तैत्तिरीय उपनिषद दीक्षा मंत्र का अर्थ क्या है? +
सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। स्वाध्याय में आलस्य न करो। माता को देवता समान मानो। पिता को देवता समान मानो। आचार्य को देवता समान मानो। अतिथि को देवता समान मानो। जो कर्म निर्दोष हों, उन्हीं का अनुसरण करो, अन्य का नहीं।
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