उपनिषद और वेदांत
निर्वाणाष्टकम्
भगवान शिव / आत्मा
आदि शंकराचार्य रचित यह स्तोत्र आत्मा की शुद्ध, असीम प्रकृति का बोध कराता है, "मैं शिव हूँ" के भाव में।
कब जपें
गहन ध्यान के समय, या आत्मचिंतन के अभ्यास में।
श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं, न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे। न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
उच्चारण (रोमन)
Manobuddhyahankara-Chittani Naaham, Na Cha Shrotra-Jihve Na Cha Ghrana-Netre, Na Cha Vyoma Bhumir-Na Tejo Na Vayuh, Chidananda-Rupah Shivoham Shivoham.
हिंदी में अर्थ
मैं मन, बुद्धि, अहंकार या स्मृति नहीं हूँ। मैं कान, जीभ, नाक या आँख भी नहीं हूँ। मैं आकाश, पृथ्वी, अग्नि या वायु भी नहीं हूँ। मैं चेतना और आनंद स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः, न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोशः। न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
उच्चारण (रोमन)
Na Cha Prana-Samjno Na Vai Pancha-Vayuh, Na Va Sapta-Dhatur Na Va Pancha-Koshah, Na Vak-Pani-Padau Na Cha-Upastha-Payu, Chidananda-Rupah Shivoham Shivoham.
हिंदी में अर्थ
मैं प्राण-वायु नहीं हूँ, पाँच प्राण-वायुओं में से कोई भी नहीं हूँ। मैं सप्त धातु या पाँच कोश भी नहीं हूँ। न वाणी हूँ, न हाथ-पैर, न मल-मूत्र के अंग। मैं चेतना और आनंद स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।
श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ, मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः। न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
उच्चारण (रोमन)
Na Me Dvesha-Ragau Na Me Lobha-Mohau, Mado Naiva Me Naiva Matsarya-Bhavah, Na Dharmo Na Chartho Na Kamo Na Mokshah, Chidananda-Rupah Shivoham Shivoham.
हिंदी में अर्थ
मुझमें न द्वेष है न राग, न लोभ है न मोह, न अहंकार है न ईर्ष्या। मुझे न धर्म चाहिए, न अर्थ, न काम, न मोक्ष। मैं चेतना और आनंद स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।
श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं, न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः। अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
उच्चारण (रोमन)
Na Punyam Na Papam Na Saukhyam Na Dukham, Na Mantro Na Tirtham Na Veda Na Yajnah, Aham Bhojanam Naiva Bhojyam Na Bhokta, Chidananda-Rupah Shivoham Shivoham.
हिंदी में अर्थ
न मुझ पर पुण्य लगता है न पाप, न मुझे सुख छूता है न दुःख। मुझे न किसी मंत्र की आवश्यकता है, न तीर्थ की, न वेद की, न यज्ञ की। मैं न भोजन हूँ, न भोज्य वस्तु, न भोगने वाला। मैं चेतना और आनंद स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।
श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
न मे मृत्युशङ्का न मे जातिभेदः, पिता नैव मे नैव माता न जन्म। न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
उच्चारण (रोमन)
Na Me Mrityu-Shanka Na Me Jati-Bhedah, Pita Naiva Me Naiva Mata Na Janma, Na Bandhur Na Mitram Gurur Naiva Shishyah, Chidananda-Rupah Shivoham Shivoham.
हिंदी में अर्थ
मुझे मृत्यु का भय नहीं है, न कोई जाति-भेद है। न मेरे कोई पिता हैं, न माता, न मेरा कोई जन्म। न कोई बंधु, न मित्र, न गुरु, न शिष्य। मैं चेतना और आनंद स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।
श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो, विभुर्व्याप्त सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणि। सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
उच्चारण (रोमन)
Aham Nirvikalpo Nirakara-Rupo, Vibhur-Vyapta Sarvatra Sarvendriyani, Sada Me Samatvam Na Muktir-Na Bandhah, Chidananda-Rupah Shivoham Shivoham.
हिंदी में अर्थ
मैं विकाररहित, आकाररहित और सर्वव्यापी हूँ, सभी इंद्रियों में उपस्थित हूँ। मेरे लिए सदा समत्व है, न मुक्ति है न बंधन। मैं चेतना और आनंद स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ।
सामान्य प्रश्न
निर्वाणाष्टकम् क्या है और इसका क्या महत्व है? +
आदि शंकराचार्य रचित यह स्तोत्र आत्मा की शुद्ध, असीम प्रकृति का बोध कराता है, "मैं शिव हूँ" के भाव में।
निर्वाणाष्टकम् कब जपना चाहिए? +
गहन ध्यान के समय, या आत्मचिंतन के अभ्यास में।
निर्वाणाष्टकम् का अर्थ क्या है? +
मैं मन, बुद्धि, अहंकार या स्मृति नहीं हूँ। मैं कान, जीभ, नाक या आँख भी नहीं हूँ। मैं आकाश, पृथ्वी, अग्नि या वायु भी नहीं हूँ। मैं चेतना और आनंद स्वरूप हूँ, मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।
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