सत्यमेव जयते
संस्कृत
सत्यमेव जयते नानृतम्॥
उच्चारण
Satyameva Jayate Naanritam.
अर्थ
सत्य ही सदा विजयी होता है, कभी असत्य नहीं। मुण्डक उपनिषद से लिया गया यह श्लोक भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है।
संस्कृत सुभाषित
सुभाषित का अर्थ है "सुंदर वचन" — छोटे-छोटे संस्कृत श्लोक जो सत्य, धर्म, विद्या, परिश्रम और आचरण की गहरी बात कुछ ही पंक्तियों में कह देते हैं। हर श्लोक के साथ संस्कृत, उच्चारण में सहायक ट्रांसलिटरेशन और सरल अर्थ।
सत्य, अहिंसा और धर्म-मार्ग पर चलने की सीख देने वाले श्लोक।
संस्कृत
सत्यमेव जयते नानृतम्॥
उच्चारण
Satyameva Jayate Naanritam.
अर्थ
सत्य ही सदा विजयी होता है, कभी असत्य नहीं। मुण्डक उपनिषद से लिया गया यह श्लोक भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है।
संस्कृत
अहिंसा परमो धर्मः॥
उच्चारण
Ahimsa Paramo Dharmah.
अर्थ
अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, दूसरों को न सताना ही सर्वोच्च कर्तव्य है।
संस्कृत
परोपकाराय सतां विभूतयः॥
उच्चारण
Paropakaraya Sataam Vibhootayah.
अर्थ
सज्जनों की सम्पत्ति और शक्ति दूसरों की भलाई के लिए ही होती है।
संस्कृत
न मातुः परं दैवतम्॥
उच्चारण
Na Maatuh Param Daivatam.
अर्थ
माँ से बड़ा कोई देवता नहीं है।
विद्या के महत्व, ज्ञान की शक्ति और सीखने की सीमा-रहित यात्रा पर श्लोक।
संस्कृत
विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वाद् धनमाप्नोति, धनाद्धर्मस्ततः सुखम्॥
उच्चारण
Vidya Dadaati Vinayam, Vinayaad Yaati Paatrataam, Paatratvaad Dhanam-Aapnoti, Dhanaad-Dharmastatah Sukham.
अर्थ
विद्या से विनय आती है, विनय से योग्यता, योग्यता से धन, धन से धर्म का पालन और अंत में सुख की प्राप्ति होती है।
संस्कृत
नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः। नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥
उच्चारण
Naasti Vidya-Samam Chakshur-Naasti Satya-Samam Tapah, Naasti Raaga-Samam Dukham Naasti Tyaga-Samam Sukham.
अर्थ
ज्ञान के समान कोई नेत्र नहीं, सत्य के समान कोई तप नहीं। आसक्ति के समान कोई दुःख नहीं, और त्याग के समान कोई सुख नहीं।
संस्कृत
विदेशेषु धनं विद्या, व्यसनेषु धनं मतिः। परलोके धनं धर्मः, शीलं सर्वत्र वै धनम्॥
उच्चारण
Videsheshu-Dhanam-Vidya, Vyasaneshu-Dhanam-Matih, Paraloke-Dhanam-Dharmah, Sheelam-Sarvatra-Vai-Dhanam.
अर्थ
विदेश में विद्या ही सबसे बड़ा धन है, संकट में विवेक धन है, परलोक में धर्म धन है, और हर जगह अच्छा चरित्र ही सच्चा धन है।
संस्कृत
स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥
उच्चारण
Swadeshe Pujyate Raja, Vidvaan Sarvatra Pujyate.
अर्थ
राजा का सम्मान केवल अपने देश में होता है, पर विद्वान का सम्मान हर जगह होता है।
मेहनत, साहस और दृढ़-संकल्प की महिमा गाने वाले श्लोक।
संस्कृत
अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम्। अधनस्य कुतो मित्रं, अमित्रस्य कुतः सुखम्॥
उच्चारण
Alasasya Kuto Vidya, Avidyasya Kuto Dhanam, Adhanasya Kuto Mitram, Amitrasya Kutah Sukham.
अर्थ
आलसी को विद्या कहाँ, अनपढ़ को धन कहाँ, निर्धन को मित्र कहाँ, और मित्रहीन को सुख कहाँ?
संस्कृत
उद्यम साहस सत्य नय संस्कृति कला विलास। सरस्वती लक्ष्मी तहाँ अविचल करें निवास॥
उच्चारण
Udhyam Sahas Satya Naya, Samskrit Kala Vilas, Saraswati Lakshmi Tahan, Avichala Kare Niwas.
अर्थ
जहाँ मेहनत, साहस, सत्य, नीति, संस्कृति और कला जीवन के मूल्य हैं, वहीं सरस्वती और लक्ष्मी अटल निवास करती हैं।
संस्कृत
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः॥
उच्चारण
Udyoginam Purusha-Simham-Upaiti Lakshmih.
अर्थ
लक्ष्मी उसी के पास जाती है जो सिंह की तरह उद्यमी और परिश्रमी हो।
संस्कृत
श्रम एव परो यज्ञः, श्रम एव परं तपः॥
उच्चारण
Shrama Eva Paro Yajnah, Shrama Eva Param Tapah.
अर्थ
हृदय से किया गया परिश्रम ही सबसे बड़ा यज्ञ है, और वही सबसे बड़ी तपस्या भी।
संस्कृत
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः॥
उच्चारण
Jala-Vindu-Nipaatena Kramashah Pooryate Ghatah.
अर्थ
पानी की एक-एक बूँद गिरते-गिरते बड़ा घड़ा भर जाता है। छोटे-छोटे लगातार प्रयास बड़े परिणाम लाते हैं।
"वसुधैव कुटुम्बकम्" जैसे मानवता की एकता के भाव को व्यक्त करने वाले श्लोक।
संस्कृत
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
उच्चारण
Ayam Nijah Paro Veti, Ganana Laghu-Chetasaam, Udaara-Charitaanaam Tu, Vasudhaiva Kutumbakam.
अर्थ
"यह अपना है, यह पराया है" — ऐसी सोच संकुचित मन वालों की है। उदार हृदय वालों के लिए तो सारी पृथ्वी ही एक परिवार है।
संस्कृत
सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥
उच्चारण
Sam Gachhadhwam Sam Vadadhwam Sam Vo Manaamsi Jaanataam, Deva Bhaagam Yathaa Poorve Sanjaanaanaa Upaasate.
अर्थ
साथ चलो, साथ बोलो, तुम्हारे मन एक-सा सोचें, जैसे प्राचीन देवताओं ने एक-मन से अपना हिस्सा स्वीकार किया था। ऋग्वेद के अंतिम सूक्त से लिया गया यह श्लोक सामूहिक समरसता का आह्वान करता है।
मधुर वाणी, आचरण की शुद्धता और शिष्टाचार पर श्लोक।
संस्कृत
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयात्, एष धर्मः सनातनः॥
उच्चारण
Satyam Bruyat Priyam Bruyat, Na Bruyat Satyam-Apriyam, Priyam Cha Naanritam Bruyat, Esha Dharmah Sanatanah.
अर्थ
सत्य बोलो, प्रिय बोलो, पर अप्रिय सत्य मत बोलो। और जो प्रिय हो पर असत्य हो, वह भी मत बोलो। यही सनातन धर्म है।
संस्कृत
प्रियवाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं, वचने का दरिद्रता॥
उच्चारण
Priya-Vaakya-Pradaanena Sarve Tushyanti Jantavah, Tasmaat Tadeva Vaktavyam, Vachane Kaa Daridrataa.
अर्थ
मीठे वचनों से हर कोई प्रसन्न होता है, इसलिए मीठा ही बोलना चाहिए। बोलने में कैसी कंजूसी?
संस्कृत
अति सर्वत्र वर्जयेत्॥
उच्चारण
Ati Sarvatra Varjayet.
अर्थ
हर चीज़ की अति से बचना चाहिए। संतुलन ही जीवन की कुंजी है।
सच्ची सम्पत्ति, विनम्रता और गुणों की श्रेष्ठता पर श्लोक।
संस्कृत
नरस्याभरणं रूपं, रूपस्याभरणं गुणः। गुणस्याभरणं ज्ञानं, ज्ञानस्याभरणं क्षमा॥
उच्चारण
Narasyabharanam Roopam, Roopasyabharanam Gunah, Gunasyabharanam Jnanam, Jnanasyabharanam Kshamaa.
अर्थ
मनुष्य का आभूषण उसका रूप है, रूप का आभूषण गुण है, गुण का आभूषण ज्ञान है, और ज्ञान का आभूषण क्षमा है।
संस्कृत
मानो हि महतां धनम्॥
उच्चारण
Mano Hi Mahataam Dhanam.
अर्थ
स्वाभिमान ही महान लोगों की सबसे बड़ी सम्पत्ति है।
संस्कृत
कोकिलानां स्वरो रूपं, स्त्रीणां रूपं पतिव्रता। विद्या रूपं कुरूपाणां, साधूनां च तथा क्षमा॥
उच्चारण
Kokilanam Swaro Roopam, Streenam Roopam Pativrataa, Vidya Roopam Kuroopaanaam, Saadhoonaam Cha Tathaa Kshamaa.
अर्थ
कोयल की सुंदरता उसकी मीठी वाणी में है, स्त्री की सुंदरता उसकी निष्ठा में, कम रूप वाले की सुंदरता उसके ज्ञान में, और साधुजनों की सुंदरता उनकी क्षमा-भावना में है।
सुभाषित संस्कृत के छोटे-छोटे श्लोक होते हैं, आमतौर पर एक या दो पंक्तियों में, जो जीवन-मूल्यों, नीति, विद्या और आचरण की बात कहते हैं। ये किसी एक ग्रंथ के नहीं होते बल्कि हितोपदेश, पंचतंत्र, महाभारत, पुराणों और अनेक स्रोतों से लिए गए होते हैं। भारतीय स्कूलों में बच्चों को शुरुआत में ये ही सिखाए जाते हैं।
"सत्यमेव जयते" मुण्डक उपनिषद (3.1.6) से लिया गया अर्ध-श्लोक है। यह भारत सरकार का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है और भारत के राष्ट्रीय चिह्न पर देवनागरी में अंकित है।
"वसुधैव कुटुम्बकम्" का अर्थ है "पूरी पृथ्वी एक परिवार है"। यह श्लोक महा उपनिषद से आया है और महाभारत तथा हितोपदेश में भी मिलता है, यह विचार व्यक्त करते हुए कि "यह अपना, यह पराया" ऐसी सोच संकुचित मन वालों की है।
हाँ, इनमें कही गई बातें — सत्य बोलना, अनावश्यक कठोर सत्य से बचना, विद्या से विनय पाना, आलस्य से बचना — आज भी उतनी ही सटीक हैं जितनी हज़ारों साल पहले थीं। कई सुभाषित तो आज भी भाषणों, स्कूल की प्रार्थना और सार्वजनिक चिह्नों पर प्रयोग होते हैं।
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