अध्याय 1, नारद और भगवान विष्णु का संवाद
एक बार नारद मुनि पृथ्वी-लोक का भ्रमण करते हुए क्षीरसागर पहुँचे और भगवान विष्णु को प्रणाम करके बोले: "प्रभु, पृथ्वी पर सब जीव कष्ट में हैं; रोग, दरिद्रता, संताप, और असंतोष उन्हें घेरे हैं। कृपया ऐसा कोई सरल उपाय बताएँ जिसे साधारण गृहस्थ भी कर सके और जिसका फल शीघ्र प्राप्त हो।"
भगवान विष्णु ने मंद-मुस्कान के साथ उत्तर दिया: "हे नारद, एक ऐसा व्रत है जो सत्य के आधार पर टिका है, इसीलिए इसका नाम "सत्यनारायण व्रत" है। इस व्रत में विशेष कठिन तप या महँगी सामग्री नहीं है; केवल श्रद्धा, स्वच्छता, और एक सादा-सा पूजन। इसकी कथा को पाँच अध्यायों में सुना जाता है। जो व्यक्ति पूर्णिमा या किसी शुभ दिन इसे विधिपूर्वक करता है और कथा सुनता है, उसकी सांसारिक मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, और अंत में उसे मेरा धाम प्राप्त होता है।"
नारद ने विनम्रता से पूछा: "इस व्रत को सर्वप्रथम किसने किया, और क्या फल पाया?" तब भगवान ने अगले अध्याय की कथा सुनाई।
अध्याय 2, ब्राह्मण शतानंद और काशी के लकड़हारे की कथा
काशी नगर में एक दरिद्र ब्राह्मण रहता था जिसका नाम शतानंद था। भिक्षा से जीविका चलती थी और सदा उदास रहता था। एक दिन वह एक वट-वृक्ष के नीचे बैठा था कि एक तेजस्वी वृद्ध ब्राह्मण उसके पास आये और उसकी दशा पूछी। शतानंद ने अपने कष्टों का वर्णन किया।
वृद्ध ब्राह्मण ने कहा: "भाई, तुम सत्यनारायण भगवान का व्रत करो; एक-एक करके सब कष्ट दूर होंगे।" इतना कहकर वे वट-वृक्ष के नीचे से अंतर्धान हो गये, वे स्वयं भगवान थे, यह शतानंद ने बाद में जाना।
शतानंद ने घर आकर पत्नी सहित सत्यनारायण व्रत किया। कुछ ही दिनों में परिवार में सुख आया, कर्ज़ चुके, और बच्चे स्वस्थ हुए। एक दिन उसके पास से एक लकड़हारा गुज़रा, ब्राह्मण के घर में उत्सव देखकर उसने पूछा: "पंडित जी, क्या हो रहा है?" शतानंद ने सत्यनारायण व्रत की महिमा बताई। लकड़हारे ने संकल्प किया कि आज बेचकर आये गये पैसों से सत्यनारायण की पूजा करेगा। उस दिन उसकी लकड़ी की बिक्री सामान्य से चौगुनी हुई। घर आकर उसने भी विधिपूर्वक व्रत किया, और उसका जीवन दरिद्रता से समृद्धि की ओर मुड़ गया।
अध्याय 3, साधु व्यापारी और उसकी पुत्री कलावती
रत्नपुर नगर के एक प्रतिष्ठित व्यापारी का नाम था "साधु", वैश्य कुल का, परंतु मन से कठोर और लोभी। संतान की चाह में उसने अपनी पत्नी के साथ मंदिर जाकर संकल्प लिया कि यदि पुत्री हो जाये तो सत्यनारायण भगवान का व्रत करेंगे।
समय आने पर उसकी पत्नी ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम "कलावती" रखा गया। परंतु व्यापारी अपने संकल्प को टालता रहा: "अभी नहीं, बाद में करूँगा।" कलावती बड़ी हुई, विवाह की अवस्था में आयी, और एक श्रेष्ठ युवक से उसका विवाह हो गया। परंतु फिर भी व्यापारी ने सत्यनारायण व्रत नहीं किया।
एक दिन व्यापारी और उसका दामाद व्यापार के लिये समुद्र यात्रा पर गये। बीच समुद्र में उनका जहाज़ अचानक खड़ा हो गया, हिलता नहीं था। अनेक उपाय करने पर भी वह आगे न बढ़ा। अंत में उन्हें एक तपस्वी मिले जिन्होंने कहा: "किसी ने भगवान से किया वचन तोड़ा है; इसीलिये यह विपत्ति आयी है।" व्यापारी को याद आया कि उसने कलावती के जन्म का संकल्प तोड़ दिया है। उसने वहीं मन-ही-मन क्षमा माँगी और लौटकर विधिपूर्वक व्रत करने की प्रतिज्ञा की। जहाज़ तत्काल चल पड़ा।
अध्याय 4, व्यापारी की समुद्री-यात्रा और परीक्षा
सागर-यात्रा से लौटते हुए व्यापारी और दामाद रत्नपुर के निकट एक बंदरगाह पर उतरे। उसी नगर के राजा के यहाँ चोरी हो गयी थी, और चोर उसी दिशा में भागे थे। सैनिकों ने व्यापारी और दामाद को देखकर उन्हें ही चोर समझ लिया, क्योंकि उनके पास बहुमूल्य वस्तुएँ थीं।
दोनों को बंदी बनाकर राजा के सामने प्रस्तुत किया गया। राजा ने बिना जाँच के उन्हें कारागार में डाल दिया, उनकी सारी सम्पत्ति ज़ब्त कर ली।
उधर रत्नपुर में व्यापारी की पत्नी और कलावती व्यापार-यात्रा से पिता-पति के लौटने की प्रतीक्षा में थीं। समय बीतता गया, कोई समाचार नहीं आया, घर की सम्पत्ति भी क्षीण होती गयी। एक दिन कलावती ने अपनी माँ से कहा: "माँ, पिताजी ने जो सत्यनारायण व्रत का संकल्प तोड़ा था, वही हमें भुगतना पड़ रहा है। अब आप और मैं मिलकर व्रत करें।"
माँ-बेटी ने विधिपूर्वक सत्यनारायण व्रत किया, कथा सुनी, प्रसाद वितरण किया। पर कलावती जल्दी में प्रसाद ग्रहण किए बिना बाहर निकल गयी, यह एक भूल थी। उधर कारागार में पिता-पति दोनों को स्वप्न में भगवान दिखे और कहा: "अब तुम्हारी पत्नियों ने वचन पूरा किया है, तुम्हें मुक्ति मिलेगी।" अगले ही दिन राजा को पश्चाताप हुआ, चोर पकड़े गये, और व्यापारी-दामाद को सम्मानपूर्वक धन-सहित मुक्त किया गया।
अध्याय 5, राजा तुंगध्वज की कथा और उपसंहार
पहले एक समय की बात है, राजा तुंगध्वज अपने घोड़ों के साथ वन में शिकार के लिये गये थे। थकावट से एक वट-वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि गाँव के गोप-बालक भक्ति-भाव से सत्यनारायण की पूजा कर रहे थे। पूजा के अंत में उन्होंने राजा को प्रसाद अर्पित किया।
परंतु राजा ने अहंकार में प्रसाद अस्वीकार कर दिया और आगे बढ़ गये। जैसे ही वे नगर पहुँचे, उनके सामने समाचार आया कि उनके सभी पुत्र एक दुर्घटना में मारे गये हैं, और राज्य में अनेक विपत्तियाँ आ खड़ी हुई हैं। राजा को समझ नहीं आया कि यह क्यों हुआ।
एक साधु ने उन्हें बताया: "हे राजन्, आपने भगवान सत्यनारायण के प्रसाद का अपमान किया था; यह उसी का फल है।" राजा तत्काल गोप-बालकों के पास लौटे, उनसे क्षमा माँगी, स्वयं प्रसाद ग्रहण किया, और अपने राज्य में सत्यनारायण व्रत का प्रचार किया। कुछ ही दिनों में उनके सारे पुत्र भगवान की कृपा से पुनर्जीवित हुए और राज्य में शांति लौटी।
यह कथा सुनाकर भगवान विष्णु ने नारद जी से कहा: "जो भी इस कथा को श्रद्धा से सुनता है, प्रसाद स्वीकार करता है, और अपनी क्षमता के अनुसार व्रत करता है, उसकी सांसारिक मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस कथा में एक बड़ी शिक्षा है: भगवान के प्रसाद का अपमान न करना, वचन को न तोड़ना, और अहंकार को अपने पर हावी न होने देना। इन तीन बातों का ध्यान रखने वाला भक्त सदा सुखी रहता है।"