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भक्ति

व्रत कथा संग्रह

व्रत का असली आधार भोजन-नियम नहीं, कथा है। हर व्रत के पीछे एक कहानी है जो उसके भाव को समझाती है, और उसी कथा को सुनने में उस व्रत का पुण्य निहित है। यह संग्रह हर बड़े व्रत की कथा को आज की भाषा में देता है, गीता प्रेस के प्रामाणिक श्लोक जहाँ बीच में हों वहाँ रहेंगे, कथा-प्रवाह की भाषा हमारी अपनी।

और व्रत कथाएँ जल्द ही जोड़ी जा रही हैं: सोलह सोमवार, करवा चौथ, वट सावित्री, एकादशी, संकष्टी चतुर्थी, प्रदोष व्रत, शनि व्रत, वैभव लक्ष्मी, पूर्णिमा और अमावस्या व्रत, चरणबद्ध रूप से।

सामान्य प्रश्न

व्रत कथा को स्वयं पढ़ सकते हैं या पंडित जी से सुनवाना ज़रूरी है? +

स्वयं पढ़ना पूर्ण रूप से मान्य है। परंपरा में केवल इतना कहा गया है कि कथा-श्रवण एक ही स्थान पर बैठकर, एकाग्र मन से हो। घर के मुखिया या कोई भी परिवार सदस्य कथा को पढ़ सकता है और बाकी सदस्य श्रद्धा-पूर्वक सुनें।

अगर उपवास शारीरिक रूप से न कर सकें तो क्या व्रत करना छोड़ दें? +

बिलकुल नहीं। परंपरा में यह स्पष्ट है: जिनकी शारीरिक स्थिति उपवास सहन नहीं कर सकती (गर्भवती, स्वास्थ्य-समस्या, वृद्ध, बच्चे) उन्हें केवल सात्विक भोजन और कथा-श्रवण से व्रत पूर्ण माना जाता है। भाव मुख्य है, भूख नहीं।

इन कथाओं की भाषा गीता प्रेस की पुस्तक से क्यों अलग है? +

गीता प्रेस के अनुवाद अपनी सुंदर पुरानी हिंदी शैली में हैं, परंतु इस साइट पर पाठ्य आज के पाठक के लिए है, इसीलिए कथा-प्रवाह की भाषा नई है, अर्थ वही। बीच में जहाँ मंत्र या श्लोक हैं वे मूल संस्कृत/अवधी में ही रहते हैं, वे उठाए नहीं जाते।

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