प्रह्लाद की कथा भागवत पुराण के सातवें स्कंध की केंद्रीय कथा है, और होली-दहन के त्योहार का भी यही ऐतिहासिक कारण है। पर इस कथा की सुंदरता किसी उत्सव-कारण से बहुत आगे जाती है: यह एक ऐसे बालक की कहानी है जिसका पूरा परिवार, राज्य और धर्म-व्यवस्था उसके विरुद्ध थी, और फिर भी उसने अपने भीतर की एक बात नहीं बदली।
एक अहंकारी पिता
हिरण्यकशिपु त्रिलोक-विजयी असुर था। ब्रह्मा से उसने अद्भुत वरदान माँगे थे: “न मनुष्य से मरूँ, न पशु से; न दिन में, न रात में; न घर के भीतर, न बाहर; न पृथ्वी पर, न आकाश में; न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से।” इन शर्तों की बाड़ में उसे अपनी अमरता का भ्रम हो गया। उसने अपने राज्य में एक ही आज्ञा जारी की: “मैं ही ईश्वर हूँ। जो अन्य किसी देवता का नाम लेगा, वह दंडित होगा।”
पर उसी घर में उसका पुत्र प्रह्लाद जन्म लेता है, जिसे गर्भ में ही देवर्षि नारद के उपदेशों से नारायण-भक्ति का बीज मिल गया था। जैसे-जैसे प्रह्लाद बड़ा होता गया, वह पिता के शिक्षकों से पाठ पढ़ने के बजाय “ॐ नमो नारायणाय” जपता रहा। सहपाठियों को भी वही सिखाने लगा।
पिता का दंड: एक के बाद एक
हिरण्यकशिपु ने पहले समझाया, फिर धमकाया, फिर दंड दिया। कथा में जो घटनाओं की शृंखला है, वह इस प्रकार है:
- पहले, विष का प्याला: प्रह्लाद ने उसे नारायण-स्मरण के साथ पीया; अमृत बन गया।
- फिर, विषधर सर्पों में डाला गया, सर्प उसके पास आते-आते पथभ्रष्ट हो गये, कहा जाता है कि प्रह्लाद के तेज ने उनके दाँतों की क्षमता ही निष्प्रभावी कर दी।
- फिर, मदमस्त हाथियों के पैरों तले, हाथी उस बालक को छू भी न सके।
- फिर, पर्वत की चोटी से नीचे फेंका गया, नारायण ने उसे गिरने से पहले ही थाम लिया।
- अंत में, बहन होलिका के साथ अग्नि में बिठाया गया, होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे न जला सकेगी, बशर्ते वह अकेली अग्नि में बैठे। कहा जाता है कि प्रह्लाद के साथ अग्नि में बैठते ही वह वरदान की शर्त पलट गयी, होलिका जल गयी, प्रह्लाद बच गया।
हर आक्रमण के बाद हिरण्यकशिपु और अधिक क्रोधित होता गया, पर प्रह्लाद के मुख से न शिकायत निकली, न प्रतिरोध की धमकी, न भय।
स्तंभ में नरसिंह
अंतिम दृश्य दरबार का है। हिरण्यकशिपु ने पूछा: “तेरा वह नारायण कहाँ है? दिखा।” प्रह्लाद ने शांति से कहा: “पिताजी, वे सर्वत्र हैं। इस स्तंभ में भी हैं।” पिता ने क्रोध में अपनी गदा से स्तंभ पर प्रहार किया। स्तंभ फट गया, और उसमें से भगवान नरसिंह प्रकट हुए, आधे मनुष्य, आधे सिंह।
नरसिंह ने हिरण्यकशिपु को अपनी गोद में उठा लिया: देहरी पर (न घर के भीतर, न बाहर), संध्या के समय (न दिन, न रात), और अपने नखों से उसका वध किया (न अस्त्र, न शस्त्र)। ब्रह्मा के वरदान की हर शर्त एक-एक करके सटीकता से पूरी हुई।
पिता के वध के बाद प्रह्लाद ने नरसिंह से पिता की मुक्ति की प्रार्थना की, बदला नहीं माँगा, बल्कि उसे मोक्ष देने की विनती की। यही प्रह्लाद के चरित्र का उच्चतम बिंदु है।
तीन सीख, बालक की भक्ति, वयस्क के जीवन के लिए
पहला, अंदर की स्थिरता बाहरी हिंसा से नहीं टूटती। प्रह्लाद पर विष, सर्प, हाथी, अग्नि: सब आज़माये गये और सब विफल हुए, क्योंकि उसकी आंतरिक स्थिति में कुछ बदलाव नहीं आया। आधुनिक भाषा में इसे “आंतरिक स्थिरता” या “एक-केंद्रित मानसिकता” कहा जाता है, जब भीतर की एक बात अटल है, तो बाहर का दबाव धीरे-धीरे अपनी शक्ति खो देता है।
दूसरा, वरदान की शब्दावली सीमित करती है, अनंत नहीं। हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा से गिनकर वरदान लिए, और उसी गिनती में उसकी मृत्यु की चाबी छिपी थी। जितनी शर्तें उसने अपनी सुरक्षा में जोड़ीं, उतने ही रास्ते नरसिंह के लिए खुले। यह जीवन का एक सूक्ष्म सूत्र है, जब हम अपने चारों ओर बहुत सारी शर्तें बनाते हैं, तो हम खुद ही उन शर्तों की मार का द्वार खोल देते हैं।
तीसरा, बदला नहीं, मुक्ति की प्रार्थना। पिता की मृत्यु के बाद प्रह्लाद ने प्रतिशोध की भावना नहीं दिखाई, बल्कि पिता के लिए ईश्वर से मोक्ष माँगा। यही भक्ति की चरम अवस्था है, जहाँ शत्रु के लिए भी कल्याण की प्रार्थना निकले।
होली की अग्नि में जो होलिका जलती है, उसकी वास्तविक व्याख्या यही है, हिंसा और वरदान का दुरुपयोग स्वयं ही जलकर समाप्त होता है, और भक्ति अछूती रहती है।
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