ध्रुव की कथा भागवत पुराण के चौथे स्कंध में आती है, और यह हर पीढ़ी के बच्चे और माता-पिता के लिए एक सीधा-सा दर्पण है, क्योंकि इसमें जो घटना बालक ध्रुव के साथ हुई, उसका आधुनिक संस्करण आज भी हर परिवार में किसी न किसी रूप में होता रहता है।

एक राजा, दो पत्नियाँ, दो बेटे

राजा उत्तानपाद की दो पत्नियाँ थीं: सुनीति और सुरुचि। सुनीति के पुत्र का नाम था ध्रुव, और सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम। राजा का प्रेम सुरुचि की ओर अधिक झुका हुआ था, और सुनीति व उसके पुत्र ध्रुव को महल में उपेक्षा ही मिलती थी।

एक दिन ध्रुव पाँच वर्ष का था, तब वह अपने पिता के पास आया और उनकी गोद में बैठने का प्रयास किया। पिता ने उसे प्रेम से देखा, पर बगल में बैठी सुरुचि ने कठोर स्वर में कहा: “बेटा, तुम इस गोद के अधिकारी नहीं हो। यहाँ बैठने का अधिकार केवल मेरे पुत्र उत्तम को है। यदि तुम्हें राजा की गोद चाहिए तो पुण्य करके फिर से मेरी कोख से जन्म लो।”

ये शब्द बालक ध्रुव के हृदय में तीर की तरह लगे। पिता ने कुछ नहीं कहा, केवल दृष्टि झुका ली। ध्रुव आँसू भरे हुए अपनी माँ सुनीति के पास पहुँचा और सब बताया।

माँ का उत्तर, बालक का संकल्प

सुनीति ने बालक को गले लगाया और कहा: “बेटा, सुरुचि के शब्द कठोर अवश्य थे, पर उनमें एक बात सही है: यदि तुम्हें इस से भी ऊँची गोद चाहिए, तो केवल भगवान की गोद है, जो किसी सौतेली-सगी के भेद से ऊपर है। जाओ, वन में जाकर उन नारायण की साधना करो, जो सबके परम पिता हैं।”

एक साधारण माँ भी उस क्षण अपने पुत्र को धैर्य का पाठ पढ़ा सकती थी, या पति के विरुद्ध क्रोध सिखा सकती थी। पर सुनीति ने न रोना सिखाया, न बदला। उसने घाव को एक ऊँची दिशा दे दी। इसी क्षण से ध्रुव की यात्रा शुरू होती है।

पाँच वर्ष का बालक अकेला वन की ओर चल पड़ा। मार्ग में उसे देवर्षि नारद मिले, जिन्होंने उसे परीक्षा-रूप से लौटने को कहा, फिर उसकी दृढ़ता देखकर उसे “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का द्वादशाक्षर मंत्र दिया, और यमुना-तट पर मधुवन में तप करने का निर्देश दिया।

छह महीने की तपस्या

ध्रुव मधुवन पहुँचा और तप में बैठ गया। पहले महीने केवल फल खाया, दूसरे में सूखे पत्ते, तीसरे में केवल जल, चौथे में केवल वायु, पाँचवे में सांस भी नियंत्रित कर ली, और छठे में एक पैर पर खड़े रहकर मंत्र-जप करता रहा। कहा गया है कि उसके तप की तीव्रता से देवताओं का सिंहासन डोल गया।

अंत में भगवान विष्णु प्रकट हुए। ध्रुव ने आँख खोली, देखा कि जिस मूर्ति का ध्यान करता था, वह प्रत्यक्ष सामने खड़ी है। कहते हैं कि तप के प्रभाव से ध्रुव के मुख से जो पहले शब्द निकले, वे सुंदर स्तुति थे, जिसे बाद में “ध्रुव स्तुति” कहा गया।

भगवान ने कहा: “पुत्र, तुम्हारी तपस्या पूर्ण हुई। जो तुमने अपने पिता की गोद के लिए साधना शुरू की थी, उसका फल तुम्हें उससे अनंत गुना अधिक मिलेगा। तुम्हें एक ऐसा स्थान दिया जायेगा जो कभी नष्ट नहीं होगा; प्रलय-काल में भी अटल रहेगा। तुम्हारा नाम आकाश में सदा के लिए स्थापित होगा, तुम ध्रुव-तारा कहलाओगे।“

सीख, बालक की भाषा में, बड़ों के लिए भी

यह कथा बच्चों की कहानी लगती है पर इसका असली भाव बड़ों के लिए है। तीन बिंदु ध्यान देने योग्य हैं।

पहला, अपमान को क्रोध में नहीं, दिशा में बदलना। सुरुचि के कठोर शब्दों को ध्रुव यदि केवल क्रोध का ईंधन बनाता, तो शायद बड़ा होकर सौतेले भाई से प्रतिशोध लेने की योजना बनाता। पर उसने घाव को एक ऊँचे उद्देश्य में लगा दिया। हर आधुनिक जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब कोई हमारा अपमान करता है, वहाँ चुनाव यही है, क्रोध या दिशा।

दूसरा, माँ की भूमिका। सुनीति ने बालक के दुख को खारिज नहीं किया, न ही उसे शिकायत में बहा दिया। उसने घाव को स्वीकारा और उसे एक बड़ा लक्ष्य दिया। यह पालन-पोषण का असली सूत्र है, बच्चे का दर्द नकारना नहीं, उसे उसके सामर्थ्य से जोड़ देना।

तीसरा, पिता की खामोशी। राजा उत्तानपाद ने उस क्षण कुछ नहीं कहा; पत्नी के कठोर शब्दों को रोका नहीं। बहुत बार पिताओं की यही खामोशी बच्चे के हृदय में गहरा घाव करती है। ध्रुव-कथा एक पिता को यह भी बताती है कि उसकी उपस्थिति में कहा हर वाक्य उसकी सहमति मान लिया जाता है।

ध्रुव आज भी उत्तर आकाश में हमारे ऊपर स्थिर है, यह कथा उसके “अटल” होने का पौराणिक आधार है। वह हर बच्चे को याद दिलाता है कि अपमान का उत्तर आकाश जितना ऊँचा हो सकता है, यदि दिशा सही चुनी जाए।

अगर आप भी बच्चों को पौराणिक कथाओं से जोड़ना चाहते हैं, तो हमारे आरती संग्रह और मंत्र संग्रह से आरंभ करें, ध्रुव जैसी कथाओं की और शृंखलाएँ जल्द आ रही हैं।